गीत - फरोश
भवानीप्रसाद मिश्र
भवानीप्रसाद मिश्रजी का परिचय :
कविता के सहज और लयकारी स्वर भवानीप्रसाद मिश्र का जन्म 29 मार्च 1913 को होशंगाबाद, मध्य प्रदेश के टिगरिया में हुआ। उन्होंने छोटी आयु से ही लिखना शुरू कर दिया था और समकालीन साहित्य पढ़ने लगे थे। बक़ौल उनके 'निराला, प्रसाद पंत फ़ैशन में थे। मेरी कमबख़्ती (जिसे कहने में भी डर लगता है) ये तीनों ही बड़े कवि मुझे लकीरों में अच्छे लगते थे। किसी एक की भी एक पूरी कविता बहुत नहीं भा गई।'' उन्हें रवींद्रनाथ, वाल्मीकि, कालिदास और भक्ति- काल के संत कवि अच्छे लगे। उन्होंने अँग्रेज़ी स्वच्छंदतावाद के कवियों वर्ड्सवर्थ और ब्राडनिंग को भी पढ़ा। उन्हें वर्ड्सवर्थ की यह बात बहुत जँची कि "कविता की भाषा यथासंभव बोलचाल की भाषा हो' और संभवतः इसे ही कविता में बरतते रहे।
वे युवा जीवन में ही गाँधीजी के प्रभाव में आए तो एक विद्यालय खोल अध्यापन कराने लगे। 1943 में तीन वर्षों की जेल की सज़ा भी पाई। 33 की आयु से खादी पहनने लगे थे। गाँधी वांग्मय के हिंदी खंडों का संपादन किया और गाँधी विचार-दर्शन से ओतप्रोत 500 कविताओं का 'गाँधी पंचशती' शीर्षक से संकलन किया। उनकी कविताओं के सहज लय का साम्य चरखे की लय से करते हुए उन्हें 'कविता का गाँधी' भी कहा गया है।
'दूसरा सप्तक' में संकलन से उनकी प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई, हालाँकि इससे पहले वे खूब छप चुके थे और सुपरिचित कवि थे। 1956 में उनके पहले संग्रह 'गीत फ़रोश' के प्रकाशन से उन्हें और प्रसिद्धि मिली। वह बच्चन की तरह उस वर्ग के कवि रहे जो लोकप्रिय भी थे और महत्त्वपूर्ण भी।
अज्ञेय ने भवानीप्रसाद मिश्र की कविता के हवाले से नई कविता में इस अनूठे रस को मिश्र रस कहा और गंभीर बातों को भी हलके ढंग से कहने को उल्लेखनीय माना। उनमें बोल-चाल के गद्यात्मक वाक्य- विन्यास को ही कविता की लयकारी भाषा में बदल लेने का अद्वितीय गुण था। वे जिस विषय को भी उठाते थे उसे ही घरेलू बना लेने का हुनर रखते थे। उनकी प्रौढ़ प्रेम की कविताएँ सहजीवन के सुख-दुःख और प्रेम की व्यंजना है। उनकी व्यंजना ही वैचारिक और राजनीतिक कविताओं में एक मज़बूत प्रतिरोध हो उठती है। हिंदी बिरादरी केभवानी भाई रहे भवानीप्रसाद मिश्र को कवियों का कवि भी कहा गया है।
'चकित है दुख', 'व्यक्तिगत' 'अँधेरी कविताएँ' 'ख़ुशबू के शिलालेख' 'बुनी हुई रस्सी' 'परिवर्तन जिए' 'त्रिकाल संध्या', 'अनाथ तुम आते हो', 'इदं न मम', 'शरीर कविता फ़सलें और फूल' 'मान सरोवर दिन', 'सम्प्रति', 'तुकों के खेल', 'नीली रेखा तक', 'तूस की आग', 'कालजयी', 'अनाम' ,'नीली रेखा तक' 'सन्नाटा' उनके प्रमुख काव्य संग्रह हैं। इसके अतिरिक्त 'कुछ नीति कुछ राजनीति' में उनके निबंधों का संकलन हुआ है। 'जिन्होंने मुझे रचा' शीर्षक से उनका एक संस्मरण ग्रंथ भी है। भवानी प्रसाद मिश्र रचनावली (सं. विजय बहादुर सिंह) और भवानी प्रसाद मिश्र संचयन (सं. अमिताभ मिश्र) में उनके संपूर्ण रचनात्मक कार्य को संकलित करने का प्रयास किया गया है।
उन्हें 'बुनी हुई रस्सी' संग्रह के लिए 1972 के साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से विभूषित किया।
भवानीप्रसाद मिश्रजी की प्रेरणादाई एव रोचक कविता....
गीत - फरोश
जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ,
मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ,
में किसिम किसिम के गीत बेचता हूँ !
जी, माल देखिए, दाम बताऊँगा,
बेकाम नहीं है, काम बताऊँगा,
कुछ गीत लिखे हैं मस्ती में मैंने,
कुछ गीत लिखे हैं पस्ती में मैंने,
यह गीत, सख्त सरदर्द भुलाएगा,
यह गीत पिया को पास बुलाएगा !
जी, पहले कुछ दिन शर्म लगी मुझको;
पर बाद-बाद में अक्ल जगी मुझको,
जी, लोगों ने तो बेच दिये ईमान,
जी, आप न हों सुन कर ज्यादा हैरान -
में सोच-समझकर आखिर
अपने गीत बेचता हूँ,
जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ,
मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ,
मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूँ।
यह गीत सुबह का है, गाकर देखें,
यह गीत गजब का है, ढाकर देखे,
यह गीत जरा सूने में लिक्खा था,
यह गीत वहाँ पूने में लिक्खा था,
यह गीत पहाड़ी पर चढ़ जाता है,
यह गीत बढ़ाए से बढ़ जाता है !
यह गीत भूख और प्यास भगाता है,
जी, यह मसान में भूख जगाता है,
यह गीत भुवाली की है हवा हुजूर,
यह गीत तपेदिक की है दवा हुजूर,
जी, और गीत भी हैं, दिखलाता हूँ,
जी, सुनना चाहें आप तो गाता हूँ!
जी, छंद और बे-छंद पसंद करें,
जी, अमर गीत और ये जो तुरत मरें!
ना, बुरा मानने की इसमें क्या बात,
मैं पास रखे हूँ कलम और दावात
इनमें से भाएँ नहीं, नए लिख दूँ,
में नए पुराने सभी तरह के
गीत बेचता हूँ,
जी हाँ, हुजूर, में गीत बेचता हूँ,
मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ,
में किसिम किसिम के गीत बेचता हूँ!
जी गीत जनम का लिखूँ, मरण का लिखूँ,
जी, गीत जीत का लिखूँ, शरण का लिखूँ,
यह गीत रेशमी है, यह खादी का,
यह गीत पित्त का है, यह बादी का !
कुछ और डिजायन भी हैं, यह इल्मी,
यह लीजे चलती चीज नई, फिल्मी,
यह सोच-सोच कर मर जाने का गीत !
यह दुकान से घर जाने का गीत !
जी नहीं दिल्लगी की इस में क्या बात,
मैं लिखता ही तो रहता हूँ दिन-रात,
तो तरह-तरह के बन जाते हैं गीत,
जी रूठ-रुठ कर मन जाते है गीत,
जी बहुत ढेर लग गया हटाता हूँ,
गाहक की मर्जी, अच्छा, जाता हूँ,
में बिलकुल अंतिम और दिखाता हूँ,
या भीतर जा कर पूछ आइए, आप,
है गीत बेचना वैसे बिलकुल पाप
क्या करूँ मगर लाचार हार कर
गीत बेचता हूँ।
जी हाँ हुजूर, में गीत बेचता हूँ,
मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ,
मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूँ!
•~ भवानीप्रसाद मिश्र
गीत फरोश का शाब्दिक अर्थ :
◾जो गीत गाकर अपना पेट भरता है।
◾फरोश का अर्थ होता है विक्रेता।
गीत फरोश का मुख्य बिंदु :
यह कविता आपने आप में सकारात्मक भावना प्रकट करती है।
गीत फरोश का अर्थ प्रयोजन :
भवानीप्रसाद मिश्रजी ने गीत फरोश में हिंदी गीत का महत्व बता रहे हैं। जब हिंदी गीत की कोई मांग न थी तब उन्होंने हिंदी गीत पर एक अद्भुत रचना समाज समक्ष प्रस्तावित की जिसमें,
"हां हुजूर, में गीत बेचता हूं"
इस तरह उनके लिए हिंदी गीत का प्राधान्य गीत माध्यम से बताया है।
और गीत लिखकर कहते हैं, साल देखिए, बताऊंगा, कुछ गीत लिखे इस मस्ती में सर दर्द भी भुला देगा ऐसा यह गीत लिखा है।
कवि कह रहे हैं कि पहले कुछ दिन कवि को शर्म लगती थी और ईमान की बात गीत में कह रहे हैं। गीत में सुबह और पुणे के बारे में बताया है।
यह जीत की गाथा लिखकर बता रहे हैं कि भूख भी नहीं लगती है। वह कह रहे हैं कि वह नए पुराने में सभी तरह के गीत बेचते हैं।
वह कह रहा है कि गीत जन्म मरण शर्म खड़ी और रश्मिका है। कवि ने अपनी दैनिक जीवन की बात बताते हैं कि गीत रोज दुकान से घर जाकर गीत वह है।
वे तरह-तरह से लिखते हैं कि गीत और कविता पढ़ने वालों को ग्राहक बताते हैं। कभी गीत बेचना पसंद नहीं करते पर यह उनकी मजबूरी और लाचारी है।
हमें इस कविता पर से कला का एक सुंदर उद्धरण प्राप्त होता है। सभी के पास कोई ना कोई कला होती है।
जिसमें वह पारंगत होते हैं उनकी वह कला को अगर किसी और के साथ बेच के व्यवहार करना पड़े तो मन के ऊपर क्या बितती है, वह समय पर दिल पर क्या गुजरती है।
तो कवि यहां पर अपनी कविता पर जो सुंदर कौशल्य हस्तगत किया है उसके ऊपर समाज की एक जो नजर है उस पर कटाक्ष कर रहे हैं।
गीत फरोश काव्य पे मेरा चिंतन :
इस कविता में कवि ने अपना दुख प्रकट किया है कि यहां कला के लिए कोई कदर नहीं है और यहां पर सभी चीज बिकाऊ है।
कवि की अपनी जीविका के लिए अपनी भावनाओं से लिखी कविताएं जैसी उनकी प्राण प्रिय रचनाओं को बेचना पड़ रहा है।
कवि बताना चाहते हैं कि सभी चीजों के मोल लग रहे हैं। पैसे के लिए कवि अपनी कविता को बेचते हुए अपना दुख व्यक्त करते हैं।
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