Sunday, 26 November 2023

सन्नाटा : भवानीप्रसाद मिश्र

मैं सन्नाटा हूं, फिर भी बोल रहा हूं, 
   मैं शान्त बहुत हूं, फिर भी डोल रहा हूं ।
                           
                                            •~ भवानीप्रसाद मिश्र

भवानीप्रसाद मिश्रजी का परिचय :

भवानीप्रसाद मिश्र  



कविता के सहज और लयकारी स्वर भवानीप्रसाद मिश्र का जन्म 29 मार्च 1913 को होशंगाबाद, मध्य प्रदेश के टिगरिया में हुआ। उन्होंने छोटी आयु से ही लिखना शुरू कर दिया था और समकालीन साहित्य पढ़ने लगे थे। बक़ौल उनके 'निराला, प्रसाद पंत फ़ैशन में थे। मेरी कमबख़्ती (जिसे कहने में भी डर लगता है) ये तीनों ही बड़े कवि मुझे लकीरों में अच्छे लगते थे। किसी एक की भी एक पूरी कविता बहुत नहीं भा गई।'' उन्हें रवींद्रनाथ, वाल्मीकि, कालिदास और भक्ति- काल के संत कवि अच्छे लगे। उन्होंने अँग्रेज़ी स्वच्छंदतावाद के कवियों वर्ड्सवर्थ और ब्राडनिंग को भी पढ़ा। उन्हें वर्ड्सवर्थ की यह बात बहुत जँची कि "कविता की भाषा यथासंभव बोलचाल की भाषा हो' और संभवतः इसे ही कविता में बरतते रहे।

वे युवा जीवन में ही गाँधीजी के प्रभाव में आए तो एक विद्यालय खोल अध्यापन कराने लगे। 1943 में तीन वर्षों की जेल की सज़ा भी पाई। 33 की आयु से खादी पहनने लगे थे। गाँधी वांग्मय के हिंदी खंडों का संपादन किया और गाँधी विचार-दर्शन से ओतप्रोत 500 कविताओं का 'गाँधी पंचशती' शीर्षक से संकलन किया। उनकी कविताओं के सहज लय का साम्य चरखे की लय से करते हुए उन्हें 'कविता का गाँधी' भी कहा गया है।

'दूसरा सप्तक' में संकलन से उनकी प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई, हालाँकि इससे पहले वे खूब छप चुके थे और सुपरिचित कवि थे। 1956 में उनके पहले संग्रह 'गीत फ़रोश' के प्रकाशन से उन्हें और प्रसिद्धि मिली। वह बच्चन की तरह उस वर्ग के कवि रहे जो लोकप्रिय भी थे और महत्त्वपूर्ण भी।

अज्ञेय ने भवानीप्रसाद मिश्र की कविता के हवाले से नई कविता में इस अनूठे रस को मिश्र रस कहा और गंभीर बातों को भी हलके ढंग से कहने को उल्लेखनीय माना। उनमें बोल-चाल के गद्यात्मक वाक्य- विन्यास को ही कविता की लयकारी भाषा में बदल लेने का अद्वितीय गुण था। वे जिस विषय को भी उठाते थे उसे ही घरेलू बना लेने का हुनर रखते थे। उनकी प्रौढ़ प्रेम की कविताएँ सहजीवन के सुख-दुःख और प्रेम की व्यंजना है। उनकी व्यंजना ही वैचारिक और राजनीतिक कविताओं में एक मज़बूत प्रतिरोध हो उठती है। हिंदी बिरादरी केभवानी भाई रहे भवानीप्रसाद मिश्र को कवियों का कवि भी कहा गया है।

'चकित है दुख', 'व्यक्तिगत' 'अँधेरी कविताएँ' 'ख़ुशबू के शिलालेख' 'बुनी हुई रस्सी' 'परिवर्तन जिए' 'त्रिकाल संध्या', 'अनाथ तुम आते हो', 'इदं न मम', 'शरीर कविता फ़सलें और फूल' 'मान सरोवर दिन', 'सम्प्रति', 'तुकों के खेल', 'नीली रेखा तक', 'तूस की आग', 'कालजयी', 'अनाम' ,'नीली रेखा तक' 'सन्नाटा' उनके प्रमुख काव्य संग्रह हैं। इसके अतिरिक्त 'कुछ नीति कुछ राजनीति' में उनके निबंधों का संकलन हुआ है। 'जिन्होंने मुझे रचा' शीर्षक से उनका एक संस्मरण ग्रंथ भी है। भवानी प्रसाद मिश्र रचनावली (सं. विजय बहादुर सिंह) और भवानी प्रसाद मिश्र संचयन (सं. अमिताभ मिश्र) में उनके संपूर्ण रचनात्मक कार्य को संकलित करने का प्रयास किया गया है।

उन्हें 'बुनी हुई रस्सी' संग्रह के लिए 1972 के साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से विभूषित किया।

भवानीप्रसाद मिश्रजी की प्रेरणादाई एव रोचक कविता....

सन्नाटा


तो पहले अपना नाम बता दूं तुमको,
फिर चुपके चुपके धाम बता दूं तुमको
तुम चौंक नहीं पड़ना, यदि धीमे धीमे
मैं अपना कोई काम बता दूं तुमको।

कुछ लोग भ्रान्तिवश मुझे शान्ति कहते हैं,
कुछ निस्तब्ध बताते हैं, कुछ चुप रहते हैं
मैं शांत नहीं निस्तब्ध नहीं, फिर क्या हूं
मैं मौन नहीं हूं, मुझमें स्वर बहते हैं।

कभी कभी कुछ मुझमें चल जाता है,
कभी कभी कुछ मुझमें जल जाता है
जो चलता है, वह शायद है मेंढक हो,
वह जुगनू है, जो तुमको छल जाता है।

मैं सन्नाटा हूं, फिर भी बोल रहा हूं,
मैं शान्त बहुत हूं, फिर भी डोल रहा हूं
ये सर सर ये खड़ खड़ सब मेरी है
है यह रहस्य मैं इसको खोल रहा हूं।
मैं सूने में रहता हूं, ऐसा सूना,
जहां घास उगा रहता है ऊना-ऊना
और झाड़ कुछ इमली के, पीपल के
अंधकार जिनसे होता है दूना।

तुम देख रहे हो मुझको, जहां खड़ा हूं,
तुम देख रहे हो मुझको, जहां पड़ा हूं
मैं ऐसे ही खंडहर चुनता फिरता हूं
मैं ऐसी ही जगहों में पला, बढ़ा हूं।

हां, यहां किले की दीवारों के ऊपर,
नीचे तलघर में या समतल पर या भू पर
कुछ जन श्रुतियों का पहरा यहां लगा है,
जो मुझे भयानक कर देती है छू कर।
तुम डरो नहीं, वैसे डर कहां नहीं है,
पर खास बात डर की कुछ यहां नहीं है
बस एक बात है, वह केवल ऐसी है,
कुछ लोग यहां थे, अब वे यहां नहीं हैं।

यहां बहुत दिन हुए एक थी रानी,
इतिहास बताता नहीं उसकी कहानी
वह किसी एक पागल पर जान दिये थी,
थी उसकी केवल एक यही नादानी !

यह घाट नदी का, अब जो टूट गया है,
यह घाट नदी का, अब जो फूट गया है
वह यहां बैठकर रोज रोज गाता था,
अब यहां बैठना उसका छूट गया है।
शाम हुए रानी खिड़की पर आती,
थी पागल के गीतों को वह दुहराती
तब पागल आता और बजाता बंसी,
रानी उसकी बंसी पर छुप कर गाती।

किसी एक दिन राजा ने यह देखा,
खिंच गयी हृदय पर उसके दुख की रेखा
यह भरा क्रोध में आया और रानी से,
उसने मांगा इन सब साँझों का लेखा-जोखा।

रानी बोली पागल को जरा बुला दो,
मैं पागल हूं, राजा, तुम मुझे भुला दो
मैं बहुत दिनों से जाग रही हूं राजा,
बंसी बजवा कर मुझको जरा सुला दो।
वो राजा था हां, कोई खेल नहीं था,
ऐसे जवाब से उसका कोई मेल नहीं था
रानी ऐसे बोली थी, जैसे इस 
बड़े किले में कोई जेल नहीं था।

तुम जहां खड़े हो, यहीं कभी सूली थी,
रानी की कोमल देह यहीं झूली थी
हां, पागल की भी यहीं, रानी की भी यहीं,
राजा हंस कर बोला, रानी तू भूली थी।
किन्तु नहीं फिर राजा ने सुख जाना,
हर जगह गूंजता था पागल का गाना
बीच बीच में, राजा तुम भूले थे,
रानी का हंसकर सुन पड़ता था ताना।

तब और बरस बीते, राजा भी बीते,
रह गये किले के कमरे रीते रीते
तब मैं आया, कुछ मेरे साथी आये,
अब हम सब मिलकर करते हैं मनचीते।

पर कभी कभी जब वो पागल आ जाता है,
लाता है रानी को, या गा जाता है
तब मेरे उल्लू, सांप और गिरगिट पर
एक अनजान सकता-सा छा जाता है।


अर्थ प्रयोजन


सन्नाटा = स्तब्ध, खामोशी, मौन

यह निर्जनता और एकांत का भी अर्थ होता है। यह सन्नाटा चीख का विलाम भी हो सकता है।

इस कविता में कहानी है। यह एक ऐसी कविता है जो वर्तमान से निकाल कर कही और ले जाती है, एक अलग दुनिया में ले जाती है। यह कविता की सबसे बड़ी खासियत है।

कवि पहले अपना नाम बताते है और दुनिया की जो रात है काम को धीमे धीमे बताकर काम करवा लेते है इस पर कवि व्यंग करते है।

फिर कवि कहते है की कुछ लोग उसको जानते नहीं इस लिए शांत और निस्तब्ध बताते पर कवि कह रहे है न के शांत है न वह निस्तब्ध।

कवि समयका वर्णन करते हुए कहते है की कभी मुजमे चल जाता है, कभी जल आता है इस बात की मेंढक और जुगनू के साथ मिलाके बताते है।

कवि प्रकृति को बताके कह रहे है की सन्नाटा हूं फिर भी बोल रहा हूं। की गेर भी रहते है और घास, इमली, पीपल की बात कहते है।

कवि बता रहे है की वह जहां पे है जिस परिस्थितियों में है । वो इसे की जगह पर पला बढ़ा है । वह किले के वर्णन करते हुए बता रहे है की नीचे तलघर समतल भू पर कुछ श्रुतुओ कहा पेरा लगाती है । वह कविता भयानक कर देती है।

इस लिए भयानक बना देती थी । इसका कारण है की कुछ लोग वहा थे वो अभी नहीं है ।

फिर कवि एक रानी की बात बताते है । की वो केसी थी वह किसी एक पागल पर जान दिया करती थी वही उसकी नादानी थी ।

फिर कवि राजा की बात बताकर कह रहे है की नदी का घाट, टूट गया फूट गया यहां राजा बैठकर रोज गाता था पर अब बैठना छूट गया ।

शाम होती है जब रानी खिड़की पर आती है गीत गाती और राजा आता है वह बंसी बजाता तब रानी छुपकर बंसी पर गाती है ।

राजा ने जब यह सब देखा तब राजा ने लेखा जोखा देखा ! 

वह राजा को बोलती है पागल को भूल जाओ, बंसी बजा कर मुझे सुला देती थी। पर वह तो राजा था पर रानी बिंदास बोल रही थी की वे किले में कोई जेल नहीं था ।

फिर कवि स्थल का वर्णन कर रहे है की रानी कौशल देह भरी फुली थी। राजा कह रहे है की तुम मुझे भूली थी।

फिर एकबार राजा रानी मिले राजा गीत गा रहा है तब रानी ताना मारती है की तुम मुझे भूल गए थे। 

फिर कवि उसकी भी बात बता रहे है और कहते है , तब के आए उसके साथी भी आए , यह कभी कभी पागल आ जाता तब रानी भी आ जाती है। तब उल्लू, साप, गिरगिट पर एक अंजान सकसा छा जाता है।

कवि यह अपने आपको शांत एव डोलता बता रहे है इसका अर्थ यह है की वह शांत होने के साथ साथ उनका स्वभाव चंचल है। वह सन्नाटे के स्वरूप है फिर भी उनके विचार और उनकी रूडी चीख चीख के उनके बारे में बताते है ।



धन्यवाद !









Saturday, 25 November 2023

રાષ્ટ્રીય દૂધ દિવસ


રાષ્ટ્રીય દૂધ દિવસ (26 નવેમ્બર 2023)


દર વર્ષે 26 નવેમ્બરને શ્વેત ક્રાંતિના જનક વર્ગીસ કુરિયનના જન્મદિવસની યાદમાં રાષ્ટ્રીય દૂધ દિવસ તરીકે મનાવવામાં આવે છે. નેશનલ ડેરી વિકાસ બોર્ડના રિપોર્ટ મુજબ, ગુજરાતમાં 2021-22માં 1600 કરોડથી વધુ લિટર દૂધનું ઉત્પાદન થયું હતું. એટલે કે દરરોજ ગુજરાતમાં 4.5 કરોડ લિટર દૂધ ઉત્પાદિત થાય છે. આ મામલે ગુજરાતમાં દેશમાં ચોથા ક્રમે છે. જ્યારે રાજસ્થાન 3230 કરોડ લિટર ઉત્પાદન સાથે પ્રથમ છે.


ગુજરાતમાં બનાસકાંઠામાં જ રાજ્યનું 18 ટકા દૂધ ઉત્પાદન થાય છે. દેશમાં વાર્ષિક 22 હજાર કરોડ લિટરથી વધુ દૂધ ઉત્પાદન થાય છે. વિશ્વના 24% દૂધ ઉત્પાદન સાથે ભારત પહેલાં સ્થાને છે. પંદર વર્ષ પહેલાં 2007-08માં ગુજરાતમાં 768 કરોડ લિટર દૂધ ઉત્પાદન હતું, જે 2021-22માં 1623 કરોડ લિટરે પહોંચ્યુ છે. જ્યારે પંદર વર્ષ પહેલાં ભારતમાં દૂધ ઉત્પાદન 10 હજાર કરોડ લિટર હતું, જે 22 હજાર કરોડ લિટરને પાર થઇ ગયું છે.


ગુજરાતી ખેડૂતોને મળશે નેશનલ ગોપાલ રત્ન એવોર્ડ  રાષ્ટ્રીય દૂધ દિવસના સંદર્ભે આજે ગુજરાતના બે ખેડૂતને ડેરી ક્ષેત્રમાં યોગદાન બદલ નેશનલ ગોપાલ રત્ન એવોર્ડ આપવામાં આવશે. બેસ્ટ ડેરી ખેડૂતની શ્રેણીમાં બીજા ક્રમે સુરતના નિલેશ આહીર અને ત્રીજા ક્રમે રહેલા વસલાડના મહિલા ખેડૂત બ્રિન્દા શાહને ડેરી મંત્રાલય દ્વારા એવોર્ડ એનાયત થશે. તેમને અનુક્રમે 3 લાખ અને 2 લાખ રૂપિયા કેશ પ્રાઇઝ મળશે. આ દિવસે પશુઓમાં આર્ટિફિશિયલ ઇન્સીમિનેશન (કૃત્રિમ ગર્ભાધાન) ટેકનિશિયનની શ્રેણીમાં પણ એવોર્ડ આપવામાં આવે છે.

વિજ્ઞાન વિષયને લગતા "હાઈકુ"

 વિજ્ઞાન વિષયને લગતા "હાઈકુ"

સ્કેલી-બ્રેસ્ટેડ મુનિયા

સ્કેલી-બ્રેસ્ટેડ મુનિયા


સ્કેલી-બ્રેસ્ટેડ મુનિયા (ગીર અભ્યારણ્ય) 21/11/2023


શીંગબાજ જેને અંગ્રેજીમાં સ્કેલી-બ્રેસ્ટેડ મુનિયા અથવા સ્પોટેડ મુનિયા (લોન્ચુરા પંક્ટુલાટા) અને પાળેલા પ્રાણીઓના વેપારમાં જાયફળ મેનિકીન અથવા મસાલા ફિન્ચ તરીકે ઓળખાય છે તે ઉષ્ણકટિબંધીય એશિયામાં જોવા મળતું ચકલીના કદનુ દાણા ચણતા પંખીના કુળમાં સમાવાાયેલ પંખી છે. તેનું નામ છાતિ અને પેટ પર અલગ સ્કેલ જેવા પીછાઓના નિશાન પર આધારિત છે. પુખ્ત પંખી ઉપરના ભાગે ઘેરા તજીયા રંગનું હોય છે અને તેની ચાંચ શંકુ આકારની અને ઘેરા રાખોડી રંગની હોય છે. આ પ્રજાતિ તેની શ્રેણીમાં કદ અને રંગમાં અલગ અલગ હોય એવી ૧૧ પેટાજાતિઓ ધરાવે છે.

આ મુનિયા રસ ઝરતાં ફળો ઉપરાંત મુખ્યત્વે ઘાસના બીજ અને અનાજના દાણા ચણે છે. તેઓ મોટેભાગે ટોળામાં ચણતા જોવા મળે છે. ચણવા દરમ્યાન તેઓ નરમ અવાજો અને સિસોટીઓ સાથે એકમેક સાથે વાતચીત કરતા જોવા મળે છે. આ પ્રજાતિ ખૂબ જ સામાજિક છે અને કેટલીકવાર મુનિયાની અન્ય પ્રજાતિઓ સાથે રહે છે. આ પ્રજાતિ ઉષ્ણકટિબંધીય મેદાનો અને ઘાસના મેદાનોમાં જોવા મળે છે. સંવર્ધન જોડી ઘાસ અથવા વાંસના પાંદડાઓનો ઉપયોગ કરીને ગુંબજ આકારના માળાઓ બનાવે છે.

આ પ્રજાતિ એશિયામાં સ્થાનિક છે અને ભારત અને શ્રીલંકાની પૂર્વથી ઇન્ડોનેશિયા અને ફિલિપાઇન્સ (જ્યાં તેને માયાંગ પકિંગ કહેવામાં આવે છે) માં જોવા મળે છે. આ પંખીને વિશ્વના અન્ય ઘણા ભાગોમાં ફેલાવવામાં આવ્યા છે અને તેની જંગલી વસ્તી પ્યુઅર્ટો રિકો અને હિસ્પેનિયોલા તેમજ ઓસ્ટ્રેલિયાના ભાગો અને યુનાઇટેડ સ્ટેટ્સ ઓફ અમેરિકામાં રહેવાસી થઈ છે. ઇન્ટરનેશનલ યુનિયન ફોર કન્ઝર્વેશન ઓફ નેચર (આઇયુસીએન) દ્વારા આ પક્ષીને ઓછામાં ઓછી ચિંતાના પક્ષી તરીકે સૂચિબદ્ધ કરવામાં આવ્યું છે.

ઉત્ક્રાંતિ :

અન્ય એસ્ટ્રિલ્ડીન્સની સાથે આ પ્રજાતિઓ એશિયામાં ઉદ્ભવ્યા હોવાનું માનવામાં આવે છે.

વર્ણન :

શીંગબાજ લગભગ ૧૧ થી ૧૨ સેન્ટિમીટર લંભાઈ ધરાવતુ (૩.૩ - ૪.૭ ઇંચ) હોય છે અને તેનું વજન ૧૨ - ૧૬ ગ્રામ (૦.૦૨ - ૦.૦૩૫ પાઉન્ડ) હોય છે. પુખ્ત વયના લોકો પાસે જાડી ઘેરા રંગની ચાંચ હોય છે, જે ખાસ કરીને અનાજ ખાતા પક્ષીઓ માં જોવા મળવી સામાન્ય છે. ઘેરા તજીયા રંગના ઉપલા ભાગો અને ઘેરા બદામી રંગનું માથું ધરાવે છે. નીચેના ભાગો ઘેરા સ્કેલ નિશાનો સાથે સફેદ હોય છે. નર અને માદા જાતિઓ ના રંગ એકસમાન હોય છે , જોકે નરની નીચેની બાજુએ ઘાટા નિશાન અને સ્ત્રીઓ કરતાં ઘાટા રંગનું ગળું ધરાવતા હોય છે.

અપરિપક્વ પક્ષીઓ નિસ્તેજ કથ્થઈ ઉપલા ભાગ ધરાવે છે - પુખ્ત વયના લોકોમાં જોવા મળતા ઘેરા માથાનો અભાવ હોય છે અને તેમાં સમાન સફેદાઈ ધરાવતા નીચેના ભાગો હોય છે જેને અન્ય મુનિયા પ્રજાતિઓના કિશોરો જેમ કે ત્રિરંગી મુનિયા (લોન્ચુરા મલાક્કા) અને ભારત અથવા શ્રીલંકાના ભાગોમાં કાળા ગળાવાળા મુનિયા (લોંચુરા કેલાટી) થી અલગ તારવવામાં ભુલ કરી શકાય છે.

વિતરણ અને નિવાસસ્થાન :

શીંગબાજ વિવિધ વસવાટોમાં જોવા મળે છે પરંતુ સામાન્ય રીતે પાણી અને ઘાસના મેદાનની નજીક હોય છે. ભારતમાં તેઓ ખાસ કરીને ડાંગરના ખેતરોમાં સામાન્ય છે જ્યાં તેઓ અનાજનો ખોરાક લેવાને કારણે તેમને પાકને નુકશાનકારક માનવામાં આવે છે. તેઓ મુખ્યત્વે મેદાનો પર જોવા મળે છે પરંતુ હિમાલયની તળેટીમાં જોવા મળે છે જ્યાં તેઓ ૨,૫૦૦ મીટર (૧.૬ માઇલ) ની નજીકની ઊંચાઈએ હાજર હોઈ શકે છે અને નીલગિરીમાં જ્યાં તેઓ ઉનાળા દરમિયાન ૨,૧૦૦ મીટર (૬,૯૦૦ ફૂટ) ની ઊંચાઈએ જોવા મળે છે. પાકિસ્તાનમાં તેઓ પશ્ચિમમાં સ્વાતથી લાહોર સુધીના એક સાંકડા પ્રદેશ સુધી મર્યાદિત છે , જે રણ વિસ્તારને ટાળે છે અને પછી લુધિયાણા અને માઉન્ટ આબુ વચ્ચેના વિસ્તારની પૂર્વમાં ભારતમાં ફરીથી જોવા મળે છે. આ પ્રજાતિ કાશ્મીરમાં પણ જોવા મળી છે , જોકે ત્યાં એ દુર્લભ છે.

તેમના મૂળ વિસ્તારની બહાર , બચી ગયેલા પક્ષીઓ વારંવાર યોગ્ય આબોહવા ધરાવતા વિસ્તારોમાં પોતાને સ્થાપિત કરે છે અને પછી નજીકના નવા વિસ્તારોમાં વસાહત કરી શકે છે. જંગલીમાં સ્થાપિત થયેલા પાંજરામાં રહેલા પક્ષીઓ અને આવી વસ્તી વેસ્ટ ઈન્ડિઝ (પ્યુઅર્ટો રિકો) માં ૧૯૭૧થી હવાઈ (૧૮૮૩થી ઓસ્ટ્રેલિયા , જાપાન અને દક્ષિણ યુનાઇટેડ સ્ટેટ્સ) મુખ્યત્વે ફ્લોરિડા અને કેલિફોર્નિયામાં નોંધાયેલી છે. ઓહુ હવાઈમાં તેઓ ત્રિરંગી મુનિયા સાથે વસવાટ માટે સ્પર્ધા કરે છે અને જ્યાં આ હરીફ હાજર હોય ત્યાં દુર્લભ હોય છે.પાંજરામાં રહેતા પક્ષી તરીકેની તેની લોકપ્રિયતાને કારણે આ પ્રજાતિને વિશ્વના અન્ય ભાગોમાં રજૂ કરવામાં આવી છે અને જંગલીમાં વસ્તી સ્થાપિત થઈ છે.

ખોરાક :

શીંગબાજ મુખ્યત્વે ઘાસના બીજ , જેમ કે લૅન્ટાના અને નાના તેનાં રસ ઝરતાં ફળોની ખાય છે. પ્રદ્યુમ્ન દેસાઈએ એમના પુસ્તક પંખીજગતમાં નોધ્યા પ્રમાણે આ પંખીને શીંગદાણા બહુ ભાવતા હોવાથી એનું આવું નામ પડ્યુ છે. એની ત્રીકોણ અને મજબુત ચાંચ નાના અનાજને કચડી નાખવા માટે યોગ્ય હોવા છતાં તેઓ નીચલા મેન્ડિબલ, જે યુરોપિયન ગ્રીનફિન્ચને બીજને સાફ કરવામાં મદદ કરે છે, બાજુની હિલચાલ દર્શાવતા નથી. અન્ય કેટલાક મુનિયાસની જેમ તેઓ સંવર્ધનની મોસમ પહેલા પ્રોટીનના સમૃદ્ધ સ્ત્રોત શેવાળને પણ ખાઈ શકે છે.

આ પક્ષીઓને કેદમાં રાખવાની સરળતાએ તેમને વર્તન અને શરીરવિજ્ઞાનના અભ્યાસ માટે લોકપ્રિય બનાવ્યા છે. ખોરાક આપવાની વર્તણૂકની આગાહી શ્રેષ્ઠ ચારો સિદ્ધાંત દ્વારા કરી શકાય છે , જ્યાં પ્રાણીઓ ખોરાકનો મહત્તમ વપરાશ કરવા માટે ખર્ચવામાં આવતા સમય અને ઊર્જાને ઘટાડે છે. આ સિદ્ધાંતનું પરીક્ષણ ભીંગડાંવાળું સ્તન ધરાવતા મુનિયા દ્વારા તેમના ખોરાકની અસરકારકતા વધારવા માટે ઉપયોગમાં લેવામાં આવતી વ્યૂહરચનાઓનો અભ્યાસ કરીને કરવામાં આવ્યું છે.

સંરક્ષણ :

શીંગબાજ એક વિપુલ પ્રમાણમાં ઉપલબ્ધ પ્રજાતિ છે અને આઇયુસીએન રેડ લિસ્ટ પર ઓછામાં ઓછી ચિંતા તરીકે વર્ગીકૃત કરવામાં આવી છે. આ પ્રજાતિ અત્યંત વિશાળ શ્રેણી ધરાવે છે અને તેની વસ્તી હજુ પણ બિન - માત્રાત્મક હોવા છતાં તે વિશાળ અને સ્થિર છે. શીંગબાજ વૈશ્વિક સ્તરે જોખમમાં નથી અને તેની મોટાભાગની શ્રેણીમાં ખૂબ જ સામાન્ય છે. જોકે , પક્ષીઓને પાળવા માટેના શોખમાંના વધારાને કારણે કેટલીક વસ્તીમાં ઘટાડો થયો છે.

ચોખાના ખેતરોમાં વિઘણા વિસ્તારોમાં વિપુલ પ્રમાણમાં ઉતરી આવીને ચોખા ચણી જવાની ટેવને કારણે તેને પાકને નુકશાનકારક તરીકે ગણવામાં આવે છે.

સંદર્ભ :

https://gu.m.wikipedia.org/wiki/%E0%AA%B6%E0%AB%80%E0%AA%82%E0%AA%97%E0%AA%AC%E0%AA%BE%E0%AA%9C








Friday, 17 November 2023

ગુજરાતના જિલ્લા

ભાવનગર

મહેસાણા

જાણવા જેવું...

ગુજરાતના વિવિધ વિસ્તારોના ભૌગોલિક ઉપનામ 

ગુજરાતનાં વિવિધ વિસ્તારોના પ્રાચીન નામો

મહાનુભાવોના ઉપનામ

ગુજરાતમાં સૌથી નાનું - મોટું

દિન વિશેષ

National Naturoparhy Day : (18 November)


18મી નવેમ્બર 1945ના રોજ, મહાત્મા ગાંધી ઓલ ઈન્ડિયા નેચર ક્યોર ફાઉન્ડેશન ટ્રસ્ટના અધ્યક્ષ બન્યા અને તમામ વર્ગના લોકોને પ્રકૃતિ ઉપચારના લાભો ઉપલબ્ધ કરાવવાના ઉદ્દેશ્ય સાથે કરાર પર હસ્તાક્ષર કર્યા, તેથી, આ દિવસને રાષ્ટ્રીય નેચરોપેથી દિવસ તરીકે મનાવવા માટે પસંદ કરવામાં આવ્યો.  .


લાભ પાંચમ:


लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः
यशेम इंदेवरा श्याम हुरुदयम थौ जनार्दन

અર્થાત લાભ અને વિજય એના ચરણ ચૂમે છે.જેના હદયમાં શ્યામ રંગવાળા ૫દ્મ સમાન વિષ્ણુનો વાસ હોય છે. એમનો ૫રાજય કઇ રીતે થઇ શકે.


આંતરરાષ્ટ્રીય વિદ્યાર્થી દિવસ: (17 નવેમ્બર)


આ દિવસનો ઉદ્દેશ્ય વિદ્યાર્થીઓ દ્વારા સામનો કરવામાં આવતી સમસ્યાઓ વિશે જાગૃતિ લાવવા, શિક્ષણ મેળવવા અને બહુસાંસ્કૃતિકતા અને વિવિધતાને આદર આપવાના તેમના પ્રયત્નોનું સન્માન કરવાનો છે.



વનસ્પતિમાં પ્રજનન